बीजेपी हो या कांग्रेस या आम आदमी पार्टी सभी अपने सोच से सामंती व्यवस्था के पोषक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वॉड्रा के झाड़ू लगाने पर यूपी के सीएम योगी यह कभी नहीं कहते कि प्रियंका उसी लायक है। और प्रियंका भी जवाब में कभी नहीं कहती कि इससे दलित और महिलाओं का अपमान हुआ है। मतलब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ मानते हैं कि झाड़ू लगाना निकृष्ट कार्य है और प्रियंका मानती है कि यह काम सिर्फ दलित और महिलाएं ही करती हैं। एक सीएम सोच से समानता के खिलाफ है दूसरी महिला नेत्री व्यवहार से भी इसके खिलाफ है।
शनिवार, अक्टूबर 09, 2021
दलित बस्ती में ही सफाई करने क्यों पहुंच जाते हैं नेता...
बीजेपी हो या कांग्रेस या आम आदमी पार्टी सभी अपने सोच से सामंती व्यवस्था के पोषक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वॉड्रा के झाड़ू लगाने पर यूपी के सीएम योगी यह कभी नहीं कहते कि प्रियंका उसी लायक है। और प्रियंका भी जवाब में कभी नहीं कहती कि इससे दलित और महिलाओं का अपमान हुआ है। मतलब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ मानते हैं कि झाड़ू लगाना निकृष्ट कार्य है और प्रियंका मानती है कि यह काम सिर्फ दलित और महिलाएं ही करती हैं। एक सीएम सोच से समानता के खिलाफ है दूसरी महिला नेत्री व्यवहार से भी इसके खिलाफ है।
मंगलवार, अगस्त 18, 2020
सारी दार्शनिकता श्रीकृष्ण से शुरू होकर उन्हीं में समाप्त हो जाती है!
यह देश, यहां की मिट्टी, यहां के लोग अपने आप में अनगिनत आश्चर्यों से भरे हुए हैं. हजारों साल पहले कही गई बातों, दिए गए उपदेश पीढ़ी दर पीढ़ी से गुजरते हुए आज जन-जन में व्याप्त हो गया है. देश के दर्शनशास्त्रियों और विचारकों को पढ़ते हुए कई बार लगता है इन लोगों ने हजारों साल पहले कही गई बातों को अपने तरीके से उसी बात को लिखा है. अर्थात् मूल शब्द वही हैं लेकिन उसकी व्याख्या अभी के अनुसार की गई है. और वह व्याख्या अतीत की कही गई बातों की पुनरावृति ही है. स्वामी तुलसी दास ने जिस रूप की व्याख्या अपनी हरेक रचना में करते रहे उसी की व्याख्या कबीर दास अलग तरीके से अपनी रचनाओं में करते नजर आते हैं. सुरदास की भी व्याख्या इससे अलग नहीं है.
इसका एक उदाहरण देश के कवि हृदय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता में देख सकते हैं.
उन्होंने अपने देश भारत की वंदना करते हुए जो लिखा, उस कविता को यहां लिख रहा हूं और फिर योगेश्वर श्रीकृष्ण की एक बात को भी लिखूंगा. कबीर दास ने किस तरीके से उस विराट रूप को कहा है वह भी आश्चर्य से भर देने वाला है. चाहे किसी की भी रचना हो, कई बार लगता है कि ये सभी एक ही बात अपने अपने तरीके से कह रहे हैं. पहले भारत भूमि की वंदना में लिखे गए स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की यह कविता...
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में उपदेश देते हुए कहा था...
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।
अर्थात्
''हे धनंजय! मुझसे परे अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है. यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है.''
किसी कवि की व्याख्या इस देश के लिए, यहां के कण कण के लिए कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण के दिए गए उपदेश की वर्तमान समय में की गई व्याख्या ही तो है. श्रीकृष्ण जैसे कुछ शब्दों में सारी व्यापकता को समाहित कर देते हैं वैसी व्यापकता साधारण मनुष्य में हो भी नहीं सकती. वह ऐसा लिख भी नहीं सकता. 14वींं शताब्दि में जन्में कबीर भी जब कहते हैं तो ऐसा ही कहते हैं. वो भी उस असाधारण मानव की व्याख्या करने में खुद को सक्षम नहीं मानते हैं. उनकी यह पंक्ति देखिए...
सात समुंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरनी सब कागद करौं, (तऊ) हरि गुन लिखा न जाइ॥
अर्थात्
''यदि मैं इन सातों समंदर को अपनी लेखनी की स्याही की तरह और इस धरती को एक कागज़ की तरह प्रयोग करूं फिर भी श्री हरि के गुणों को लिखा जाना सम्भव नहीं है.''
श्रीमद्भगवद्गीता में जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि वही सबकुछ है और उसी में सबकुछ समाया हुआ है तो इसी बात को कबीर अपने तरीके से उस विराट रूप की व्याख्या कर जाते हैं.
इस भूमि की दार्शनिकता भगवान कृष्ण का ही अंश है. यहां की भाषा उनकी भाषा का ही विस्तार है. यहां का प्यार उनके प्यार का ही रूप है. ऐसा कुछ भी नहीं जो उनसे अलग है, उनकी सोच उनके दर्शन से अलग है. रोम-रोम में राम और कण-कण में शंकर की अवधारणा वस्तुत: वही हैं. सबमें और सभी जगह व्याप्त. हजारों साल पहले कहे गए उनके शब्दों का विस्तार इस भूमि के वासियों में विस्तार पा गया है. कण कण में व्याप्त हो गया. हममें आपमें सबमें समा गया.
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल जी को याद करते हुए उनकी रचना को पढ़ा था और आज योगेश्वर श्रीकृष्ण के उपदेश को पढ़ते हुए दो पंक्ति लिखने का लोभ आ गया. सोचा इसे बहाने कुछ व्यक्तित्व को याद कर लूं जो हमें समय-समय पर राह दिखा जाते हैं. जीवन के तमाम क्षणों में आनंद का स्रोत, उसका कारण और जीवन को सार्थक एवं सामर्थवान बनाने का हौसला दे जाते हैं.
जय श्रीकृष्ण!
शनिवार, फ़रवरी 27, 2016
उम्मीद की तरह, सवालों का जिंदा रहना जरूरी है...
शोर के बीच बसे शहर में जब शांति की जगह मिलने लग जाए तो अटपटा लगता ही है. कार्य की प्रकृति को समझने की जगह कहां बचती है जब आप किसी और रंग में रंगे हों. शांति का भर जाना मुर्दों की पहचान मानने लगे तो फिर जिंदा रहने की शर्त क्या हो, यह सोचना होगा. सवाल करना होगा. पहले खुद से ही. दूसरे तो दूसरे ही होते हैं. पहले के बाद आते हैं. पहले खुद को समझना होगा. इस समझने की प्रक्रिया में यह भी मुमकिन है कि कुछ बूढ़े सवाल मर जाए, कुछ नये सवाल पैदा हों. क्योंकि कुछ सीखने के लिए सवालों का पैदा होना जरूरी है, उसका जिंदा रहना जरूरी है.
हम अक्सर डस्टबीन बनने को तैयार रहते हैं क्योंकि हम ऐसे ही है. अच्छे ख्यालों पर भरोसा हो न हो बुरे पर तो कर ही लेते हैं. फिर कोसने को तैयार रहते हैं बिना चीजों को समझे अपनी संतुष्टि के लिए. खुद की संतुष्टि बड़ी चीज है. लबो की आजादी के बीच पता नहीं, हम यह क्यों नहीं सोच पाते कि ऐसी कितनी परतें हमें खुद में समा लेने के लिए तैयार रहती हैं और हम खुले रहते हैं अपने ही बनाई धारणाओं और विचारों के बंद दरवाजों में. ऐसे में नई चीजें कहां दिखाई देने वाली. क्या यह संभव है जब हम अपने लबो को खोलें तो निकलें कुछ जिंदा सपनें? बंद मुट्ठी को खोले तो गिरे कुछ ऐसे बीज जो फलदार वृक्ष बने?
हालांकि यह सोच जंगल में छोड़ देने वाली एक सड़क जैसी ही है फिर भी उम्मीद बनाएं रखने में क्या बुराई है.
सोमवार, अगस्त 19, 2013
समझदारों का गीत
हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।
चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।
वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।
- गोरख पाण्डेय
गुरुवार, अप्रैल 25, 2013
जीत के लिए क्या जरूरी है?
जीत के लिए क्या जरूरी है?
कुशल सेनापति? कारगर रणनीति? आधुनिक सोच? परिस्थितियों का सही विश्लेषण? जीत की जिद? स्वयं का मूल्यांकन? दुश्मन का आकलन?
इनमें हमारे पास क्या है? अगर हमारे पास उपरोक्त सभी सवालों का ईमानदार जवाब है तो हम जीत सकते हैं. केवल जोश और बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला. उदाहरण कई हैं...
1. विश्व का सर्वाधिक कुशल सेनापति नेपोलियन अपनी जिद में रूस के जार की बात भूल गया. रूस के जार का कथन, 'मेरे दो सेनापति, जनवरी और फरवरी, मुझे कभी धोखा नहीं देते' कोई हल्की बात नहीं थी. नेपोलियन इन बातों पर ध्यान नहीं दिया, दुश्मन का मूल्यांकन करने और परिस्थितियों को समझने में चूक गया और जिसका परिणाम उसे सेना की भीषण तबाही और शर्मनाक वापसी के रूप में चुकानी पड़ी. नेपोलियन एक कारगर रणनीति बनाने वाला तथा समय से आगे की सोच रखने वाला, जोशीला और जीत की जिद पर सवार कई सफल अभियानों को अंजाम देने वाला एक कुशल सेनापति था. लेकिन परिस्थितियों का और स्वयं का सही आकलन नहीं कर पाया. और इस तरह हरदम जीतने वाला सर्वाधिक कुशल सेनापति हार गया.
2. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी हिटलर की जिद ने अपनी सेना को रूसी सर्दी में तबाह कर दिया. हिटलर भी परिस्थितियों का सही मूल्यांकन नहीं कर पाया और मात खा गया. पराजय के रूप में परिणाम इतिहास में दर्ज है.
गुरुवार, जनवरी 10, 2013
विश्वास दिलाने के तरीके की तलाश...
मंगलवार, नवंबर 06, 2012
BJP के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक कौन, जिन्ना का जिन्न या दाउद का IQ
जिन्ना का जिन्न जिस तरीके से बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के भीतर आलोचना झेलने को मजबूर कर दिया था ठीक वैसी ही स्थिति पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी के कुख्यात अपराधी दाऊद इब्राहिम वाले बयान पर होते जा रही है. पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेता गडकरी से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. इन नेताओं में यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, गुरूमूर्ति शामिल हैं.
दूसरी ओर राम जेठमलानी ने साफ कहा है कि नितिन गडकरी को तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. जेठमलानी ने कहा कि इस्तीफा दे देने से काई दोषी नहीं हो जाता. उन्होंने कहा कि गडकरी को अपने पद से इस्तीफा देकर जांच का सामना करना चाहिए. उनका पद पर बने रहना पार्टी के हित में नहीं है. इससे पहले महेश जेठमलानी ने भी गडकरी के विरोध में राष्ट्रीय कार्यकारणी से इस्तीफा दे दिया था.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह भी जिन्ना पर लिखे अपने किताब के कारण पार्टी से निकाल दिए गए थें. उनका पार्टी से निष्कासन उनके पुस्तक-विमोचन के 26 घंटे के अंदर ही हो गया था. जिस समय जसवंत सिंह को पार्टी से निकाला गया था उस समय लालकृष्ण आडवाणी संसदीय बोर्ड के सबसे वरिष्ठ सदस्य थें. इससे पहले आडवाणी जिन्ना पर दिए गए अपने बयान को लेकर अपना अध्यक्ष पद गवां चुके थें.
वर्ष 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी द्वारा जिन्ना को धर्म निरपेक्ष बताए जाने के बाद अध्यक्ष पद छोड़ने को विवश होना पड़ा था. हालांकि आडवाणी ने अपने बयान के पक्ष में पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली में 11 अगस्त 1947 को दिये गये जिन्ना के प्रसिद्ध भाषण का हवाला दिया था जिसमे उन्होंने कहा था कि नये राष्ट्र पाकिस्तान में अब न कोई हिन्दू होगा और न मुसलमान. सभी पाकिस्तानी होंगे और राज्य सभी धर्मावलम्बियों से समान व्यवहार करेगा. वैसे यह अलग बात है कि जिन्ना की इस सलाह पर पाकिस्तानी हुक्मरानों ने कभी अमल नहीं किया.
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी दाऊद इब्राहिम को लेकर दिए गए अपने बयान के बाद कितने समय तक पार्टी के अध्यक्ष पद पर बने रहते हैं.
सोमवार, जुलाई 16, 2012
...तो जान खतरनाक ढंग से सस्ती हो सकती है
ऑनर किलिंग के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खाप पंचायतें अवैध हैं. प्रेमी जोड़े को प्रशासन सुरक्षा दें. कोर्ट के इस टिप्पणी के बाद उम्मीद है चहकते प्रेमी युगल पर पुलिस डंडा नहीं बरसाएगी और खाप पंचायतों पर भी कोर्ट का असर दिखेगा. खाप पंचायतों की ओर से जारी होने वाले कातिलाना फरमानों पर अंकुश लग जाएगी.
जब प्रतिष्ठा विकृत ढंग से जान से प्यारी हो जाए तो जान खतरनाक ढंग से सस्ती हो सकती है. यह एक सच्चाई है और यह सच्चाई कई प्रेमी युवा शरीर पर बड़ी क्रूरता के साथ उकेड़ी गई. अगर आंकड़ों की बात कहें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में हर वर्ष एक हजार से ज्यादा युवा अपने ही लोगों के हाथों मार डाले जाते हैं. इनमें से 900 तो अकेले अन्न उगाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मारे जाते हैं.
इज्जत के लिए कत्ल ('ऑनर किलिंग') के इस चलन के लिए प्रत्यक्ष तौर पर 'जाति या धर्म की पवित्रता की रहना' का बहाना बनाया जाता है. ये सारी हत्याएं शादियों से जुड़ी होती हैं, और इनका स्त्रोत होता है, हर समुदाय के अपने-अपने अजीबोगरीब नियमों का ढांचा जो जातियों की परतों में बंटे समाज में विजातीय विवाह के ढांचे पर सवार होता है.
जिस देश में प्रेम विवाह को एक विशेष प्रकरण माना जाता है, अपने जीवनसाथी का चुनाव करने की सजा आम तौर पर उन लोगों का परिवार ही तय कर देता है, जो ऐसा करने की हिमाकत करते हैं. कुख्यात खाप पंचायत जैसे परंपरागत जातिगत संगठनों से समर्थन प्राप्त, जिसमें हरियाणा में एक पूर्व मुख्यमंत्री तक शामिल हैं, यह अपराध करने वाले अपने आपको सामाजिक व्यवस्था का रक्षक समझते हैं.
हालांकि अभी दो दिन पहले ही हरियाणा की खाप पंचायत ने कन्या भ्रूण हत्या रोकने की दिशा में साकारात्मक पहल की घोषणा की है. पहली बार एक महिला इस पंचायत में बोली. इसे आप सुखद बदलाव के रुप में देख सकते हैं लेकिन बदलते बदलते पता नहीं कितनी अजन्मी बच्ची और कितने प्रेमी युगल अपनी जान खो देंगे.
बुधवार, दिसंबर 07, 2011
पहले मंत्री को दुरूस्त करें सोशल मीडिया को नहीं...
पिछले एक महीने से यह कवायद जारी है. केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल इस मुहिम में लगे हुए हैं. इसी सिलसिले में कपिल सिब्बल ने गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर उनसे यह कहा कि वह अपने सोशल साइटो से सभी आपत्तिजनक कंटेंट (जो राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस से संबंधित है)हटाए. हालांकि गूगल ने ऐसा करने से मना कर दिया लेकिन फेसबुक की ओर से यह बयान आया कि आपतिजनक कंटेट हटाने की सुविधा साइट पर दी गई है फिर भी वह इस मामले पर ध्यान देगा.
सवाल यह भी है कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है? क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर आपत्तिजनक कंटेंट ही आपत्तिजनक माने जाएंगे या किसी और के मामले में भी ऐसा होगा? क्या सरकार की नियत इस मामले में साफ है? क्या अन्ना के आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया का उपयोग जिस तरीके से हुआ उससे सरकार डर गई है? क्या अन्ना के आंदोलन फिर से शुरू होने के मद्देनजर सरकार इस टूल को भोथरा करने की कोशिश कर रही है? क्या इसी बहाने सरकार मीडिया (सोशल) पर सेंसरशिप लाना चाहती है?
ढ़ेरों सवाल है और उसके ढ़ेरों जवाब हो सकते हैं. सरकार क्यों नहीं आईटीएक्ट के तहत कार्रवाई कर रही है? सरकार क्यों नहीं अपने पास मॉनिटरिंग की सुविधा बढ़ाना चाहती है? सरकार फेसबुक और ट्वीटर पर क्यों नहीं जनता की आवाजों को सुनना चाहती है? ऐसे तमाम उपाए है जिस पर सरकार को अमल करना चाहिए.
इंटरनेट यूज करने वाले भारत में तकरीबन 10 करोड़ हैं. मोबाइल यूजर की संख्या 85 करोड़ पहुंच चुकी है. फेसबुक और ट्वीटर बहुत ही निजी पहुंच का मीडियम है. मोबाइल पर जिस तरीके से इसका उपयोग बढ़ रहा है आने वाले समय में यह काफी हदतक जनमत बनाने में सहायक होने वाला है. ऐसा भी हो सकता है कि यही सोशल मीडिया यह तय करे कि देश में किसकी सरकार बनें. सफर भले ही लंबा है लेकिन ऐसा होना है और होकर रहेगा.
सरकार निगरानी की ओट में सोशल मीडिया पर सेंसर लगाना चाह रही है. पता नहीं सरकार यह क्यों सोच रही है कि जैसा वह सोच रही है सारा देश भी वैसा ही सोचें? हमें तो लगता है इस तरीके की बचकानी हरकतों से सरकार को अलग रहना चाहिए. यह उनकी कैबिनेट नहीं है. वैसे कैबिनेट की मंत्री भी उनकी कहां सुनते हैं. पहले उनको दुरूस्त करें सोशल मीडिया को नहीं.
शुक्रवार, नवंबर 04, 2011
'क्या यह मध्यरात्रि का नरसंहार है....'
ऐसा लग रहा है जैसे सरकार लोक कल्याणकारी संस्था के रूप में नहीं, एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में काम रही है जहां लागत मूल्य के आधार पर वस्तुओं की कीमत तय की जाती है. वरना महंगाई से निपटना एक सरकार के लिए इतना मुश्किल हो जाएगा, यह हास्यास्पद लग रहा है.
सरकार में अर्थशास्त्रियों की नहीं एक सोच की कमी है. शरद पवार के बयान चीनी की कीमत को बढ़ाने के लिए काफी होता था. गोदामों में सड़ते अनाज को गरीबों में मुफ्त बांटने की सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कृषि मंत्री शरद पवार ने नकार दिया था. पवार का कहना था कि मुफ्त गेहूं बांटना मुमकिन नहीं है.
जब से यूपीए सरकार में आई पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में पंख लग गए. इसका असर खाद्य पदार्थों समेत कई अन्य रूप में देखने को मिला. महंगाई दर आसमान छूने लगी. फल, सब्जियों के दाम आम आदमी की पहुंच से देखते देखते निकल गए. सरकार आश्वासन दे दे कर कई दिसम्बर निकाल चुकी है. बैंक का रेपो रेट घर और गाड़ी की किस्त पर भारी पड़ने लगा है. महंगाई की किस्त जब पेट्रोल बम के रूप में सामने आता है तो सरकार आश्वासन देती है, दिसम्बर में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वह दिसम्बर किस वर्ष का होगा पता नहीं चलता.
पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि पर ममता बनर्जी ने काफी कठोर संदेश देने की कोशिश की है. बीजेपी ने भी कड़ा ऐतराज जताकर अपनी विपक्षी पार्टी होने का सबूत दे दिया है. लेकिन सबसे शानदार टिप्पणी थी यशवंत सिन्हा की, 'ये मध्यरात्रि का नरसंहार है.' इन टिप्पणियों का क्या... हमलोग कोई लोक कल्याणकारी राज्य में तो रहते नहीं हैं... अब तो बस एक ही उपाए है अगले तीन वर्षों के लिए... हमें इस देश को चलाने वाली प्राइवेट लिमिटेड कंपनी पर भरोसा करना चाहिए.
गुरुवार, सितंबर 08, 2011
पहले मुंबई अब दिल्ली, आखिर कब तक?
देश के युवराज की संज्ञा से नवाजे गए माननीय राहुल गांधी का कुछ दिन पहले यह बयान आया था जिसमें यह कहा गया था कि हम सभी आतंकी हमलों को नहीं रोक सकते. सरकार कहती है हम महंगाई और भ्रष्टाचार नहीं रोक सकते. सरकार के मंत्री जब बयान देते हैं तो उनके बयानों में ठोस बात कम वादा ज्यादा होता है. अगर यह सरकार कुछ कर नहीं सकती तो क्यों बनी हुई है? क्या घोटाला को छोड़कर और कुछ करने में यह सरकार सक्षम नहीं है?
जनता टैक्स देती है क्या नेताओं को लूट कर अपना घर बनाने के लिए? जनता टैक्स देती है क्या कोरी बातें सुनने के लिए? जनता टैक्स देती है क्या अपने जान से हाथ धोने के लिए? जनता टैक्स देती है क्या मरने के बाद आश्रितों को मुआवजा देने के लिए?
संसद की सर्वोच्चता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता... ऐसा कहना है हमारे सांसदों का. तो क्या महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता, आतंकवाद से पीडि़त जनता इन सांसदों की पूजा करें या उस चौखट की पूजा करें और आशा भरी नजरों से अपने ही द्वारा चुने गए उन सांसदों की ओर देखें जो आतंकवादियों को फांसी की सजा से बचाने की वकालत कर रहे हैं? क्या वैसे सांसदों से न्याय और सुरक्षा की उम्मीद करें जो वोट की राजनीति के कारण ठोस निर्णय लेने में अक्षम है?
ऐसा लगने लगा है जैसे चुने हुए सांसद भारत के भाग्य विधाता बन गए हैं इसमें जनता कहीं नहीं है, इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी की नहीं है.
गुरुवार, अगस्त 11, 2011
(जन)लोकपाल और आरक्षण के बीच 'समझदारों का गीत'
खैर सबकी अपनी समस्या और अपना दर्द है. ऐसे में आज काफी समय बाद फिर से गोरख पांडे जी की कुछ कविताओं को पढ़ने का मौका मिला. उनमें से एक कविता को यहां दे रहा हूं, आप भी पढ़ें:
समझदारों का गीत
हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।
चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।
वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।
-गोरख पांडे
रविवार, अगस्त 07, 2011
ईमान बेचते चलो, तुम भी महलों में रह लोगे...
दूसरी पार्टी जो विपक्ष में बैठी है उसको इस बात का गुमान है कि सवाल पूछने का हक सिर्फ मेरे पास है. लेकिन मैं अपनी मर्जी से ही कुछ करुंगा. मैं जनता के प्रति जबावदेह नहीं हूं. वैसे जनता मेरा क्या कर लेगी... अगर मैं भ्रष्टाचार के मामले में सत्ता पक्ष का साथ देता हूं तो मुझे भी लाभ मिलेगा.
मेरे विचार से कुछ ऐसा ही खेल खेला जा रहा है संसद में. कांग्रेस कर्नाटक पर चुप रहेगी तो बीजेपी दिल्ली के मसले पर कुछ नहीं बोलेगी. महंगाई से निपटना किसी के लिए आसान काम नहीं है तो दोनों पार्टी इसपर चुप रहेंगे और संसद में भी दोस्ताना बहस करेंगे... भले ही इसका फायदा कालाबाजारी करने वाले ले जाएं. मंत्री एक और बयान देंगे और अगले दो महीने तक महंगाई के नाम पर लूटने की पूरी आजादी मिल जाएगी क्योंकि सरकार जब खुद ही कहेगी कि महंगाई अगले दो महीनें कम नहीं होगी तो चाहे जिस किमत में सामान बेचो कोई क्या कर लेगा.
मीडिया भी अपनी भूमिका को शायद ही ठीक से निभा पा रही है. सांसद तो मीडिया वालों से भी यह कहने से नहीं चुक रहे हैं कि आप अपने काम से काम रखें. वे तो यहां तक नसीहत देने लगे हैं कि आपका काम है मेरे संदेश को जनता तक पहुंचाने का तो सिर्फ वही करें और सवाल पूछना बंद करें. वैसे सांसद महोदय की बातों का कुछ असर होता भी है और कुछ पत्रकार अपना सवाल पूछना भूल जाते हैं. शायद उन्हें इस बात का डर हो जाता होगा कि अगर संबंध खराब हो गए तो अगली बार खबर कैसे मिलेगी.
ऐसे मौके पर महान कवि गोपाल सिंह नेपाली की एक कविता याद आ रही है जो कभी अपने हॉस्टल के दिनों में मैंने पढ़ा था... हालांकि यह कविता 1962 के युद्ध के दौरान लिखी गई थी लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी है.
मेरा धन है स्वाधीन कलम
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
गुरुवार, जुलाई 14, 2011
मेरा देश भगवान भरोसे और आपका...
इन बयानों पर सबकी अपनी राय हो सकती है. देश के तीन कद्दावर नेता जो राय जाहिर कर रहे हैं उससे देश की जनता मेरे समझ से गर्व महसूस नहीं करेगी. क्या राहुल अपने बयान से यह जाहिर करना चाहते हैं कि देश के सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी नहीं है, ऐसे हमले होते रहेंगे और हम इसका कुछ नहीं कर सकते?
महाराष्ट्र में कांग्रेस और केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार है तो क्या पी चिदम्बरम अपने बयान से यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि महाराष्ट्र सरकार की कहीं कोई खामी नहीं है और ना ही केंद्र सरकार की कोई कमी है?
...और श्रीप्रकाश जी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मुंबई में 31 महीनों तक कोई आतंकी हमला नहीं हुआ तो यह उनकी या उनके सरकार की उपलब्धि है?
अगर सरकार हमें सुरक्षा नहीं दे सकती, देश में भ्रष्टाचार नहीं रोक सकती, महंगाई से निजात नहीं दिला सकती तो फिर क्या कर सकती है? क्या वह सिर्फ निर्दोषों पर लाठीचार्य (जैसा कि बाबा रामदेव एवं उनके समर्थकों पर रामलीला मैदान में हुआ) करने के लिए बैठी है या फिर महंगाई बढ़ाने की पेट्रोल डीजल की बढ़ी कीमतों की सूचना देने के लिए बैठी है?
मेरे विचार से अपने देश में सुरक्षा व्यवस्था सहित तमाम व्यवस्थाएं भगवान भरोसे चल रही है. आपका क्या मानना है?
गुरुवार, मई 12, 2011
क्या सरकार दलाल की भूमिका निभा रही है?
इससे पहले यूपी की सपा सरकार ने स्पेशल इकोनॉमी जोन के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों को जमींदार बना चुकी है. जिस काम के लिए जमीन लिया गया था अभी तक तो वह काम नहीं हो पाया... लेकिन लगता है बसपा सरकार की सोच इस मसले पर सपा से अलग है. सरकार जमीन एक्सप्रेस वे (यमुना, गंगा जैसे एक्सप्रेस वे) के नाम पर ले रही है. जाहिर सी बात है सड़क के दोनों ओर विकास के काम होंगे और यह काम कोई न कोई कंस्ट्रक्शन कंपनी ही करेगी.
खैर यह तो सरकार की परेशानी है. फिलहाल किसानों की परेशानी उसे मिलने वाली रकम को लेकर है. प्रशासन अपने कानून को लेकर और किसान अपनी जमीन को लेकर अड़े हुए हैं. इसी बीच नेताओं को अपनी जमीन दिखने लगी है. कई नेताओं को वहां की जमीन पर खेती करने का मौका भी मिल गया है. फसल 2012 में कटेगी जब राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे. इसके लिए लगभग सभी राष्ट्रीय या स्थानीय दल जी जान से जुट गए हैं. आप इसे कह सकते हैं कि सभी लोग विकास के काम में लग गए हैं.
इस विकास की दौर में क्या कुछ और बेहतर नहीं हो सकता, मसलन सरकार विकास के नाम पर दलाल की भूमिका निभाना छोड़कर जमीन किसानों की सहमति से ले और उसे उसी दर पर भुगतान करवाए जिस दर पर वह बिल्डरों को दे रही है? पता नहीं यह कितना व्यवहारिक होगा लेकिन मेरे विचार से कुछ ऐसा जरुर होना चाहिए.
बुधवार, अप्रैल 27, 2011
गुस्से का प्रतीक चप्पल या...
गुस्सा कब चप्पल के रुप में तब्दील हो जाए कहना मुश्किल होता है. जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर उछला जूता ऐसा उछला कि कई देशों में इसे देखा गया. कई ऑनलाइन गेम बने. यह गेम इतना पॉपुलर हुआ कि लोग अपना फ्रस्टेशन निकालने के लिए इसका उपयोग करने लगे.
जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर उछला जूता नीचे गिरा ही था कि अपने देश में भी जूता उछलना शुरू हो गया. पत्रकार जरनैल सिंह के गुस्से का शिकार बने तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम. एक बड़े अखबार के इस पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ी. आडवाणी पर भी चप्पल उछले और ...फिर तो सिलसिला ही शुरु हो गया. कई और छोटे बड़े नेता इसका शिकार बने.
वैसे जनरल मुशर्रफ से लेकर चीन के राष्ट्रपति तक इसका शिकार बन चुके हैं. भारत में इसकी शुरूआत कब से हुई कहना थोड़ा मुश्किल होगा. जितनी जानकारी मिल पा रही है उसके अनुसार सुरेश कलमाडी इसके प्रणेता हो सकते हैं. कलमाडी जब 32 वर्ष के थें तो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर चप्पल उछाला था. चप्पल तो मोरारजी भाई की कार से टकराकर रुक गई लेकिन कलमाडी जी का राजनीति करियर परवान चढ़ने लगी. उस समय कई कांग्रेसी नेता ने उनकी तारीफ की थी.
कलमाडी की कोर्ट में पेशी के दौरान जूता उछला और बड़ी खबर बन गई. हो सकता है उनको अपने पुराने दिन याद आ गए हों...
सोमवार, अप्रैल 18, 2011
कहीं राजनीति में उलझकर न रह जाए अन्ना की मुहिम...
दूसरा विवाद उठा समिति में शांति भूषण एवं प्रशांत भूषण को शामिल किए जाने को लेकर. बाबा रामदेव की नाराजगी सबसे ज्यादा रही. इसपर भी अन्ना को सफाई देनी पड़ी. हालांकि बात संभली लेकिन विवाद मीडिया में आ ही गया.
जनलोकपाल बिल को लेकर कपिल सिब्बल के बयान पर भी सफाई देने का काम चलते रहा जिसमें उन्होंने कहा था कि इस बिल से कुछ नहीं होने वाला है (शिक्षा, चिकित्सा और अन्य समस्याओं के लिए लोग नेता को ही फोन करते हैं, वह समस्या तो इस बिल से हल नहीं होगा...). बाद में अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे को यहां तक कहना पड़ा कि अगर उनको इस बिल पर भरोसा नहीं है तो उन्हें समिति से इस्तीफा दे देना चाहिए. इसे आप तीसरा विवाद कह सकते हैं.
चौथा विवाद रहा शांति भूषण और अमर सिंह के बीच हुए तथाकथित बातचीत का टेप जारी होना. यह मसला 2006 का है जैसा कि अमर सिंह बता रहे हैं. अमर सिंह का कहना है कि उन्हें जबरदस्ती इस मामले में घसीटा जा रहा है जबकि शांति भूषण की ओर से यह कहा जा रहा है कि यह टेप ही फर्जी है. अन्ना हजारे को इस पर भी सफाई देना पड़ रहा है.
विवादों के बीच अन्ना के नरम रुख की बात भी हो रही है और मूल जन लोकपाल बिल में आए कई बदलाव की भी. समिति की पहली बैठक होने तक ये सारे विवाद और बदलाव देखने को मिल रहे हैं. अभी तो कई और बैठकें होनी है. कहीं ऐसा न हो कि लोकपाल बिल बनाए जाने तक जन लोकपाल बिल की सारी बातें बदल जाए और जो सरकार चाह रही है वही बिल लोगों के सामने आए... क्योंकि राजनीति और समाज सेवा का कोई सीधा संबंध हमें अभी तक नहीं दिखा. जिस काम से हमारे नेताओं का कोई फायदा न हो, वह उस काम को कभी नहीं करेंगे. आखिर नेता और समाजसेवक में यही तो अंतर होता है.
बुधवार, अप्रैल 13, 2011
जाति की राजनीति आखिर कब तक?
कई समाजशास्त्रियों का मत है कि अंग्रेजों की गुलामी ने भारत को जितना नुकसान नहीं पहुंचाया, उससे कहीं अधिक जाति-प्रथा ने देश को कमजोर किया. मुट्ठी भर विदेशी आक्रमणकारियों ने अंग्रेजों से पहले भी भारत पर हमले किए और इस देश को लूटकर चले गए. अगर उस दौरान समाज एक होता और एक-एक पत्थर भी इन आक्रमणकारियों पर फेंक देता, तो शायद आक्रमणकारी उसी में दब जाते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
बाद में अंग्रेजों ने इस व्यवस्था का जबरदस्त फायदा उठाया. शिक्षा एवं प्रशासनिक व्यवस्था में थोड़ा फेर-बदल कर गुलामी की मानसिकता को और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया. जमीनदारी प्रथा पूरे देश में जड़ फैला चुकी थी. गुलाम बनाए जाने का धंधा बदस्तूर जारी था. ऐसे में लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति ने मानसिक रूप से गुलाम बनाए जाने की तकनीक को मजबूत करना शुरू कर दिया. हालांकि इसके कारण देश के लोगों को काफी फायदा हुआ और अंग्रेजी की पढ़ाई उनके लिए एक हथियार बना. जिन लोगों पर इसका असर एक भाषा की तरह हुआ, वो लोग सफल रहे, लेकिन जिन लोगों पर इसका असर शासक वर्ग की तरह हुआ, वे मैकाले बन बैठे. उनके लिए अंग्रेजी सर्वश्रेष्ठ थी और अन्य भाषा गुलाम. अंग्रेजी साहित्य सर्वोच्च थी और अन्य साहित्य का स्थान उसके बाद.
जाति का नाम जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. इसका निर्धारण जब कभी भी हुआ था, उसका पैमाना निश्चित रूप से आज का नहीं था. जाति को लेकर कुछ लोगों ने अपनी सीमा तय कर ली और यह भी तय कर लिया कि इसके दायरे में किसी और जाति के लोगों को नहीं आने देना है. परिणाम हुआ जो ब्राह्मण (जन्म से) थे, वो कभी क्षत्रिय नहीं बने और जो वैश्य थे, कभी ब्राह्मण नहीं बने. समाज को सही तरीके से संचालन करने का स्वप्न देखकर जिसने जाति व्यवस्था बनाई, उन्हें शायद इस प्रकार की बेईमानी या नियम पालन नहीं करने पर सजा का भय नहीं था. जाति के अंदर तो तमाम रक्षाकवच बन गए कि कैसे इसमें बने रहना है, लेकिन इससे ऊपर उठकर सोचने और पूरी व्यवस्था को संचालित करने की प्रणाली शायद विकसित नहीं हो पाई. इसका काफी दूरगामी परिणाम देखने को मिला.
जिस युग में शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देश के लिए काम कर रहे थे, उसी युग में आर्य समाज जैसी संस्थाएं भी काम कर रही थीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उदय हो रहा था और देश में क्रांति की एक नई लहर चल पड़ी थी. मेरे विचार से शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु एक ही दिन में अंग्रेजों के खिलाफ नहीं हुए होंगे. उन्होंने बचपन से अंग्रेजों के राज करने के तरीकों, उनकी मानसिक सोच, समाज में घटित होने वाली घटनाओं को करीब से देखा, तब जाकर कही वो भगत सिंह, सुखदेव या राजगुरु के रूप में लोगों के सामने आए. कर्म से उन्होंने साबित किया कि वो एक देशभक्त हैं, न कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र.
जाति को लेकर राजनीति कई स्तरों पर हो रही है और पहले भी होती रही है. महाभारत काल में कर्ण को सिर्फ इस आधार पर गुरु द्रोणाचार्य ने शस्त्र शिक्षा देने से वंचित कर दिया था कि वो क्षत्रिय नहीं हैं. दुर्योधन ने भले ही अपने फायदे के लिए ही सही, लेकिन कर्ण को वह सम्मान दिया, जो जाति से ऊपर उठकर था. एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा लगाकर शस्त्र चलाना सीखा और इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इसके लिए उसे अपना अंगूठा गंवाना पड़ा. हालांकि देखने का नजरिया यह कि एकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा दे दिया था, यह किसी ने नहीं कहा कि यह गुरु की ज्यादती थी. एकलव्य की कहानी को वर्षों तक महिमामंडित किया जाता रहा और आज भी बदस्तूर जारी है.
हो सकता है यह सही रहा हो, लेकिन क्या एक गुरु का हृदय ऐसा क्रूर(?) होना चाहिए? क्या एकलव्य अगर क्षत्रिय होता, तो उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता? या यह सब जाति के मजबूत होने (या जाति को मजबूत करने) के लिए किया जा रहा था? इसका जवाब अब भी उतना ही प्रासंगिक हो सकता है, जितना उस समय होता.
जाति और मजहब का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए करती रही हैं, भले ही इससे देश का नुकसान ही क्यों न हो. शहीदों (भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव) की जाति को लेकर जो विवाद पैदा करने की कोशिश हुई है, उसके पीछे पक्ष और विपक्ष की मानसिकता सही नजर नहीं आ रही है. अब देश वैसा नहीं रहा कि ये लोग धर्म और जाति के नाम पर हिंसा फैला देंगे और देश को मुसीबत में डाल देंगे. इसके लिए इन्हें कोई और तरीका ढ़ूंढना होगा. फिलहाल हमारे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव आमरण अनशन तोड़ चुके हैं और एक नई लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं.
दलित बस्ती में ही सफाई करने क्यों पहुंच जाते हैं नेता...
बीजेपी हो या कांग्रेस या आम आदमी पार्टी सभी अपने सोच से सामंती व्यवस्था के पोषक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वॉड...
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बीजेपी हो या कांग्रेस या आम आदमी पार्टी सभी अपने सोच से सामंती व्यवस्था के पोषक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वॉड...
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हमारे पास अग्नि और पृथ्वी मिसाइल है... संचार के सारे उपकरण है... हमारा देश आने वाले समय में चांद पर कदम रखने की तैयारी कर रहा है... लेकिन ...
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दो शब्द गुंडा, मवाली और बलात्कारी आपके जनप्रतिनिधि हैं तो आप एक बार सोचिए। हो सकता है आपका यह जनप्रतिनिधि आपका ही शिकार कर बैठे। अपराध के ...




